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HINDI

发布时间:2026-09-01 | 浏览:1
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हिन्दी विश्व की एक प्रमुख भाषा है एवं भारत की राजभाषा है। केंद्रीय स्तर पर भारत में दूसरी आधिकारिक भाषा अंग्रेजी है। यह हिन्दुस्तानी भाषा की एक मानकीकृत रूप है जिसमें संस्कृत के तत्सम तथा तद्भव शब्दों का प्रयोग अधिक है और अरबी-फ़ारसी शब्द कम हैं। हिन्दी संवैधानिक रूप से भारत की प्रथम राजभाषा और भारत की सबसे अधिक बोली और समझी जाने वाली भाषा है। हालाँकि, हिन्दी भारत की राष्ट्रभाषा नहीं है क्योंकि भारत के संविधान में किसी भी भाषा को ऐसा दर्जा नहीं दिया गया था। विश्व आर्थिक मंच की गणना के अनुसार यह विश्व की दस शक्तिशाली भाषाओं में से एक है। आधुनिक मानक हिंदी, हिंदुस्तान भाषा का मानकीकृत और संस्कृतकृत पाठ है। अंग्रेजी भाषा के साथ, देवनागरी लिपि में लिखी गई हिंदी भारत की आधिकारिक भाषा है। यह भारत गणराज्य की 22 अनुसूचित भाषाओं में से एक है। हिंदी का वर्णन भारतीय संविधान के भाग 17 एवं 8वीं अनुसूची में अनुच्छेद 343 से 351 में है। 8वीं अनुसूची में शामिल 22 भारतीय भाषाएं – कश्मीरी , सिन्धी , पंजाबी , हिन्दी , बंगाली , आसामी , उडिया , गुजराती , मराठी , कन्नड़ , तेलगु , तमिल , मलयालम , उर्दू , संस्कृत , नेपाली , मढिपूडी , कोंकणी , बोडो , डोंगरी , मैथिली , संताली । हिंदी के भविष्य को लेकर हम भले चिंता जताते हों, लेकिन सच्चाई यह है कि दुनिया में हिंदी बोलने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है। 2022 के आंकड़ों के अनुसार यह दुनिया में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा बन चुकी है। 2005 में दुनिया के 160 देशों में हिंदी बोलने वालों की अनुमानित संख्या 1,10,29,96,447 थी। उस समय चीन की मंदारिन भाषा बोलने वालों की संख्या इससे कुछ अधिक थी। लेकिन 2015 में दुनिया के सभी 206 देशों में करीब 1,30,00,00,000 (एक अरब तीस करोड़) लोग हिंदी बोल रहे हैं और अब 2022 में हिंदी बोलनेवालों की संख्या दुनिया में सबसे ज्यादा हो चुकी है। डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय ने अपनी पुस्तक में दिए आंकड़ों में डॉ. जयंतीप्रसाद नौटियाल द्वारा 2012 में किए गए शोध अध्ययन के अलावा, 1999 की जनगणना, द वर्ल्ड आल्मेनक एंड बुक ऑफ फैक्ट्स, न्यूज पेपर एंटरप्राइजेज एसोसिएशन अंक, न्यूयार्क और मनोरमा इयर बुक इत्यादि को हिन्दी आधार बनाया है। डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय की हिन्दी पुस्तक के अनुसार हिंदी के बाद दुनिया में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा चीन की मंदारिन है। लेकिन मंदारिन बोलने वालों की संख्या चीन में ही भारत में हिंदी बोलने वालों की संख्या से काफी कम है। विश्व में हिन्दी मुंबई विश्र्वविद्यालय के हिंदी विभाग के पूर्व अध्यक्ष डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय अपनी पुस्तक “ हिंदी का विश्र्व संदर्भ ” में सारणीबद्ध आंकड़े देते हुए कहते हैं कि भारत एक उभरती हुई अर्थव्यवस्था है। यहां के पेशेवर युवा दुनिया के सभी देशों में पहुंच रहे हैं और दुनिया भर की बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत में निवेश के लिए आ रही हैं। इसलिए एक तरफ हिंदी भाषी दुनिया भर में फैल रहे हैं, तो दूसरी ओर बहुराष्ट्रीय कंपनियों को अपना व्यवसाय चलाने के लिए अपने कर्मचारियों को हिंदी सिखानी पड़ रही है। तेजी से हिंदी सीखने वाले देशों में चीन सबसे आगे है। चीनी Xinhua News Agency की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में हिंदी बोलने वालों की संख्या करीब 78 % है। जबकि चीन में केवल 70% चीनी ही मंदारिन बोलते हैं। दुनिया में 64 करोड़ लोगों की मातृभाषा हिंदी है। जबकि 20 करोड़ लोगों की दूसरी भाषा, एवं 44 करोड़ लोगों की तीसरी, चौथी या पांचवीं भाषा हिंदी है। भारत के अलावा मॉरीशस , सूरीनाम , फिजी , गयाना , ट्रिनिडाड, टोबैगो और कनाडा आदि देशों में हिंदी बहुप्रयुक्त भाषा है। भारत के बाहर फिजी ऐसा देश है, जहां हिंदी को राजभाषा का दर्जा प्राप्त है। फिजी में राजभाषा के रूप मे हिन्दी हिंदी को वहां की संसद में प्रयुक्त करने की मान्यता प्राप्त है। मॉरीशस में तो बाकायदा “ विश्र्व हिंदी सचिवालय ” की स्थापना हुई है, जिसका उद्देश्य ही हिंदी को विश्र्वस्तर पर प्रतिष्ठित करना है। चीन में हिन्दी भाषा फिलहाल चीन के 20 विश्र्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ाई जा रही है। 2022 तक वहां हिंदी पढ़ाने वाले विश्र्वविद्यालयों की संख्या 100 तक पहुंच जाने की उम्मीद है। यहां तक कि चीन ने अपने 10 लाख सैनिकों को भी हिंदी सिखा रखी है। उपाध्याय के अनुसार अंतरराष्ट्रीय मंच पर बढ़ी भारत की साख के कारण भी दुनिया के लोगों की हिंदी और हिंदुस्तान में रुचि बढ़ाई है। भारत की आजादी के समय भारतीय संविधान में किसी भी भाषा को राजभाषा का दर्जा प्राप्त नहीं था। क्यूंकी भारत में इसको लेकर कई बार विवाद हुए। परंतु आजादी के दो बर्ष बाद, 14 सितंबर 1949 को भारत की संविधान सभा द्वारा हिंदी को राजभाषा के रूप में दर्जा दिया गया था। हिन्दी के अतिरिक्त अंग्रेजी को भी द्वितीयक राजभाषा के रूप में चुना गया। ‘ राष्ट्रभाषा प्रचार समिति ‘ जो हिन्दी के विकास और उत्थान के लिए कार्य करती थी, ने लोगों को हिन्दी का महत्व बताने के लिए प्रत्येक बर्ष “ 14 सितंबर ” को ‘ हिंदी राजभाषा दिवस ‘ घोषित करनें के लिए सरकार से अनुरोध किया। भारत सरकार ने हिन्दी के महत्व को समझते हुए, इसे भारतीय संविधान के भाग 17 के अनुच्छेद 343 (1) में 14 सितंबर 1949 को स्थापित कर दिया। अनुच्छेद 343 (1) में लिखा है कि “राष्ट्र की राज भाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी।” तबसे 14 सितंबर के दिन को ही “ हिंदी दिवस ” मनाने का निर्णय लिया गया। विश्व हिंदी दिवस कहा जाता है कि भारत देश अनेकता में एकता का प्रतीक है। ऐसा क्यूँ है? इसका कारण है- भाषा, हिन्दी ही लोगों को एकता के सूत्र में बांधती है। हिन्दी ही विश्व भर में बसे भारतीय एवं हिन्दी भाषी देशों के लोगों को भावनात्मक रूप से एक साथ जोड़ने का काम भी करती है। इसीलिए से ‘ 10 जनवरी ‘ का दिन विश्व हिन्दी दिवस के रूप में हर्ष के साथ मनाया जाता है। हिन्दी के वैश्विक स्तर पर प्रचार-प्रसार के लिए 10 जनवरी 1975 से ‘ विश्व हिंदी सम्मेलन ‘ का आयोजन शुरू किया गया। इसी कारण से प्रत्येक बर्ष ‘ 10 जनवरी ‘ का दिन विश्व हिन्दी दिवस ( World Hindi Diwas ) के रूप में मनाया जाता है। विश्व हिन्दी दिवस के मनाने का उद्देश्य वैश्विक स्तर पर हिन्दी को बढ़ावा देना, जागरूकता पैदा करना तथा हिन्दी को वैश्विक भाषा के रूप में स्वीकार करवाना है। ‘हिन्दी’ शब्द की उत्पत्ति ‘भारत’ देश की भौगोलिक सीमाओं तथा उसके लिए प्रयुक्त होने वाले नामों (विशेषणों) में निरन्तर परिवर्तन होता रहा है। ब्रह्मवर्त , भारतखण्ड , जम्बूद्वीप , आर्यावर्त , उत्तरापथ , दक्षिणापथ तथा भारत इसके पुरातन नाम हैं। हिन्द तथा हिन्दुस्तान शब्द भी इसकी संज्ञा के रूप में प्राचीनकाल से ही व्यवहृत होते रहे हैं। ये दोनों शब्द वस्तुत: ईरानी सम्पर्क से व्युत्पन्न हुए हैं। इनमें भी हिन्दी शब्द को विद्वानों ने हिन्दुस्तान की अपेक्षा पुरातन माना है। पारसियों की प्राचीनतम धार्मिक पुस्तक ‘ दसातीर ‘ में ‘ हिन्द ‘ शब्द का उल्लेख मिलता है। पं. रामनरेश त्रिपाठी के मतानुसार ईरान के लोग, महर्षि वेदव्यास के समय में ही इस देश को हिन्द कहने लगे थे। ईरान के शाह गस्तस्य के काल में महर्षि वेदव्यास के ईरान जाने का उल्लेख मिलता है। ऋग्वेद में ‘ सिन्ध ’ और ‘ सप्त सिन्धवः ‘ शब्द नदी और सात नदियों के निमित्त कई बार तथा विशिष्ट प्रदेश के अर्थ में एक बार प्रयुक्त हुआ है। डॉ. भोलानाथ तिवारी के मतानुसार प्राचीन ईरानी साहित्य में ‘ हिन्द ‘ शब्द का सिन्धु नदी तथा उसके आस-पास के प्रदेश के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। एक प्रदेश विशेष की संज्ञा के रूप में इस शब्द का प्रयोग महाभारत में भी मिलता है। सम्भवत: इन शब्दों ने याजकों के साथ ईरान की यात्रा की और वहीं हैन्दु , हिन्दू तथा हफ्त हिन्दवः या हफ्त हिन्दवो ( अवेस्ता में ) रूप में प्रचलित हुए। उल्लेखनीय है कि भारतीय आर्यभाषा की ‘ स ‘ ध्वनि ईरानी में ‘ ह ‘ ध्वनि के रूप में उच्चारित होती है। जैसे- सप्त-हफ्त, अहुर-असुर। प्राचीन पह्नवी में हिन्दू , हिन्दुक और हिन्दश शब्द मिलते हैं। मध्यकालीन ईरानी में प्रचलित विशेष प्रत्यय ‘ ईक ‘ जोड़कर ( हिन्द+ईक ) हिन्दी क फिर हिन्दी ग शब्द बना। ‘हिन्दी’ शब्द का मूल अर्थ ‘हिन्दी’ शब्द का मूल अर्थ है- ‘ हिन्दी का’ अर्थात् भारतीय। व्याकरण के अनुसार इसे योगरूढ़ शब्द कहा जा सकता है। इस प्रकार के नामकरण दूसरे बहुत से देशों के लिए प्रचलित हैं, यथा- जापानी, चीनी, नेपाली, भूटानी, रूसी, अमरीकी आदि। धीरे-धीरे ‘ हिन्द ‘ शब्द का प्रयोग देशबोधक से निवासियों का बोधक बन गया। आरम्भ में यहाँ से निर्यात की जाने वाली वस्तुओं की पहचान हेतु भी यह शब्द प्रयुक्त होता था। उदाहरण के लिए अरबी तथा फारसी भाषा में ‘ हिन्दी ‘ शब्द का प्रयोग एक विशेष प्रकार की तलवार (जो भारतीय इस्पात की बनी होती थी) के लिए होता था। ‘हिन्दी’ शब्द का प्रयोग ‘ हिन्दी ‘ शब्द के प्रचलन के प्रसंग पर विचार करते समय यह स्पष्ट होता है कि संस्कृत , पालि , प्राकृत तथा अपभ्रंश भाषाओं में यह शब्द प्रयुक्त नहीं हुआ है। मुसलमानों के आगमन तक भारत में भाषा के लिए ‘ भाषा ‘ या ‘ भारवा ‘ शब्द प्रचलित थे। ये शब्द 1800 ई. के बाद तक प्रचलन में रहे। जहाँ संस्कृत ग्रन्थों की टीका को ‘ भाषा-टीका ‘ कहा गया है, वहीं फोर्ट विलियम कॉलेज में हिन्दी पढ़ाने हेतु नियुक्त होने वाले लल्लू लाल एवं सदल मिश्र को ‘ भाषा मुंशी ‘ या ‘ भारवा मुंशी ‘ कहा गया है। मुसलमानों के आगमन (13वीं-14वीं शताब्दी ई.) के साथ मध्यप्रदेश की जनसामान्य की बोली (भाषा) के लिए हिन्दी , हिन्दवी , हिन्दुई प्रभृति नाम प्रचलित हुए। भाषा के सन्दर्भ में हिन्दी शब्द का आरम्भिक प्रयोग भाषा के सन्दर्भ में हिन्दी शब्द का आरम्भिक प्रयोग पंडित विष्णु शर्मा की पुस्तक ‘ पंचतंत्र ‘ की भाषा के लिए हुआ है। यह पुस्तक संस्कृत भाषा में लिखी गयी है। पह्नवी (ईरानी) नरेश नौशेरवाँ (531-579 ई.) के दरबारी कवि वरजवैह (बर्जूयह/बजरोया) ने भारत आकर यह अनुवाद पह्नवी (प्राचीन ईरानी) में किया। नौशेरवाँ के विद्वान् मंत्री बर्जुरमहर ने (वस्तुत: जिनके द्वारा यह अनुवाद करवाया गया था) ने उक्त पुस्तक की भूमिका में लिखा है, “ यह अनुवाद जबाने हिन्दी से किया गया है।’ ‘ ईरानी अनुवाद की लोकप्रियता के उपरान्त इस ग्रन्थ का अन्य भाषाओं में भी अनुवाद हुआ और सभी में इसकी भाषा को ‘ जबाने-हिन्दी ‘ ही कहा गया। 7वीं सदी से लेकर 10वीं सदी तक यह शब्द संस्कृत , पालि , प्राकृत एवं अपभ्रंश भाषा की संज्ञा के रूप में निरन्तर प्रयुक्त होता रहा। तदुपरान्त मुसलमान रचनाकारों ने ‘ जबाने हिन्दी ‘ के स्थान पर “ हिन्दी ” और “ हिन्दवी ” शब्द का प्रयोग आरम्भ किया। हिन्दुस्तानी शब्द की व्युत्पत्ति अनेक विद्वानों ने ‘ हिन्दुस्तानी ‘ शब्द की व्युत्पत्ति, अंग्रेजी के प्रभाव से मानी है, किन्तु कालान्तर में सम्पन्न होने वाले शोध-कार्यों से यह स्पष्ट हो चुका है कि यह शब्द उनके यहाँ आगमन से पूर्व ही प्रचलित हो गया था। शाहजहाँ (1627-1657 ई.) के समय की पुस्तकों (तारीख-ए-फरिश्ता तथा बादशाहनामा) में इस शब्द का प्रयोग हुआ है। इससे भी पूर्व स्वामी प्राणनाथ (1581-1694 ई.) ने अपनी पुस्तक ‘ कुलजम स्वरूप ‘ में ‘ हिन्दुस्तान ‘ शब्द का प्रयोग भाषा के निमित्त किया है। परन्तु इसमें सन्देह नहीं है कि इस भाषा का व्यापक प्रचलन यूरोपीय लोगों के सम्पर्क से ही शुरू हुआ। उन्होंने हिन्दी, हिन्दवी या अन्य नामों की अपेक्षा ‘ हिन्दुस्तानी ‘ शब्द का प्रयोग अधिक किया है। डच पादरी जे. केटलार (1715 ई.) ने अपने देशवासियों की सुविधा के लिए हिन्दी व्याकरण लिखा और उसे ‘ हिन्दुस्तानी ग्रामर ‘ कहा। कालान्तर में फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना के बाद वहां के भाषा विभाग के अध्यक्ष गिलक्राइस्ट ने भारत की प्रमुख भाषा “हिन्दुस्तानी” कहा और इससे सम्बन्धित अनेक पुस्तकों का लेखन किया। उर्दू का प्रयोग 18वीं शताब्दी में जब उर्दू का प्रयोग एक भाषा विशेष के लिए रूढ़ हो गया तब उर्दू और हिन्दी के मिले-जुले रूप को हिन्दुस्तानी कहा जाने लगा। किन्तु 19वीं सदी के अन्तिम चरण में हिन्दू-उर्दू को लेकर मतभेद आरम्भ हो गया। तदुपरान्त हिन्दी समर्थकों ने केवल हिन्दी शब्द के प्रयोग पर बल दिया। 1893 ई. में नागरी प्रचारिणी सभा तथा 1910 ई. में हिन्दी साहित्य की स्थापना इसी से की गई। किन्तु गाँधीजी हिन्दुस्तानी के प्रबल पक्षधर थे। इसका प्रमुख कारण यह था कि वे भाषा-विवाद को राष्ट्रीय एकता के लिए घातक समझते थे। इसके लिखित रूप के लिए वे देवनागरी और फारसी दोनों लिपियों का प्रचलन चाहते थे। गिलक्राइस्ट के समय तक हिन्दुस्तानी शब्द प्रचलन में रहा किन्तु उनके बाद अंग्रेज विद्वानों ने भी धीरे-धीरे हिन्दी या हिन्दवी शब्द का प्रयोग आरम्भ कर दिया । 1812 ई. में कैप्टर टेलर ने फोर्ट विलियम कॉलेज का वार्षिक-विवरण प्रस्तुत करते समय हिन्दी शब्द का आधुनिक अर्थ में सम्भवतः प्रथम प्रयोग किया। उनका वक्तव्य था, “मैं केवल हिन्दुस्तानी या रेख्ता का जिकर कर रहा हूँ, जो फारसी लिपि में लिखी जाती है।……….मैं हिन्दी का जिक्र नहीं कर रहा, जिसकी अपनी लिपि है।…….जिसमें अरबी-फारसी के शब्दों का प्रयोग नहीं होता और मुसलमानी आक्रमण से पहले जो भारतवर्ष के समस्त उत्तर प्रान्त की भाषा थी।” भाषा के रूप में ‘हिन्दी’ के विविध अर्थ उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट होता है कि प्रारम्भ में हिन्दी शब्द क्षेत्र बोधक था। कालान्तर में यह यहाँ की वस्तुओं और निवासियों के लिए प्रयुक्त होने लगा। अन्तत: यह भाषा के लिए रूढ़ हो गया, परन्तु हिन्दी भाषा के सन्दर्भ में भी आज इसके तीन अर्थ मिलते हैं- व्यापक अर्थ, सामान्य अर्थ, विशिष्ट अर्थ। अपने व्यापक अर्थ में हिन्दी, (बाबू श्यामसुन्दरदास तथा डॉ. धीरेन्द्र वर्मा के मतानुसार) हिन्दी-प्रदेश में बोली जाने वाली समस्त 18 बोलियों की प्रतिनिधि भाषा है। ये बोलियाँ हैं- पश्चिमी हिन्दी में- खड़ी बोली , बाँगरू ( हरियाणवी ), ब्रजभाषा , कन्नौजी और बुन्देली पूर्वी हिन्दी में- अवधी, बघेली और छत्तीसगढ़ी पहाड़ी में- पूर्वी पहाड़ी (नेपाली), मध्यवर्ती पहाड़ी (जौनसारी) राजस्थानी में- पूर्वी राजस्थानी (ढुंढाड़ी), उत्तरी राजस्थानी (मेवाती), पश्चिमी राजस्थानी (मारवाड़ी) और दक्षिणी राजस्थानी (मालवी) बिहारी में- मैथिली , मगही तथा भोजपुरी । 2. सामान्य अर्थ जॉर्ज ग्रियर्सन एवं सुनीति कुमार चटर्जी प्रभृति भाषा वैज्ञानिकों के अनुसार केवल पूर्वी हिन्दी एवं पश्चिमी हिन्दी की बोलियों को ही हिन्दी भाषा की बोली के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए। इस प्रकार इनकी मान्यताओं के धरातल पर हिन्दी को 8 (पश्चिमी हिन्दी की 5 और पूर्वी हिन्दी की 3) बोलियों की प्रतिनिधि भाषा मानते हुए उसका उद्भव ‘शौरसेनी और अर्द्धमागधी’ अपभ्रंश से माना जा सकता है। 3. विशिष्ट अर्थ हिन्दी भाषा का समसामयिक आशय है- खड़ी बोली हिन्दी भारतीय संविधान के अन्तर्गत इसे भारत संघ की राजभाषा के रूप में (अनुच्छेद 120, 210 तथा 343 से 351 तक) एवं 8वीं अनुसूची में देश की 18 प्रमुख बोलियों के अन्तर्गत स्थान दिया गया है। परिनिष्ठित हिन्दी, मानक हिन्दी या व्यावहारिक हिन्दी के रूप में व्यवहृत होने वाली यही हिन्दी आज देश के (लगभग) 42 प्रतिशत लोगों की मातृभाषा है, साथ ही 30 प्रतिशत अन्य ऐसे लोग भी हैं जिन्हें इसका व्यावहारिक ज्ञान है। इसी कारण यह देश की प्रमुखतम सम्पर्क भाषा है। हिन्दी भाषा का उद्भव हिन्दी भाषा पूर्णतया वियोगात्मक भाषा है। अपभ्रंश के उत्तरार्द्ध काल में इसका लगभग 40 प्रतिशत स्वरूप स्पष्ट हो गया था। लेकिन एक स्वतन्त्र भाषा के रूप में इसकी पहचान लगभग 1000 ई. के आस-पास स्थापित होती है। तब से अद्यावधि तक यह विकास के पथ पर निरन्तर गतिशील है। हिंदी भाषा के उद्भव और विकास का इतिहास तीन भागों में बांटा जा सकता है- आदिकाल (1000 से 1500 ई. तक) मध्यकाल (1501 से 1800 ई. तक) आधुनिक काल (1801 ई. से आज तक) 1. आदिकाल (1000 से 1500 ई. तक) हिन्दी भाषा का आदिकाल राजनीतिक दृष्टि से अस्थिरता का काल कहा जा सकता है। सर्वत्र मत्स्यन्याय की परम्परा व्याप्त थी। जर, जोरू और जमीन तथा कथित अभिमान के प्रणेता इन लोगों को पशुवत् हिंसक बना रहे थे। इस विनाशलीला से जहाँ कुछ लोग उत्साहित होते थे, वहीं बहुत-से लोग विक्षुब्ध भी। कुछेक ने इन विसंगतियों से स्वयं को मुक्त रखा। इसलिए भोग एवं योग अपूर्व समन्वय इस युग की रचनाओं में दृष्टिगत होता है। प्रसंगानुकूल राजाश्रय , धर्माश्रय में सृजित होने वाली रचनाओं के लिए डिंगल , पिंगल , दक्खिनी , अवधी , ब्रज प्रभृति विविध भाषाएँ, माध्यम भाषा के रूप में अपनायी गयीं।इस अवधि में सृजित साहित्य जो अभी तक उपलब्ध हुआ है वह मुख्य रूप में राजस्थान, उत्तरप्रदेश, बिहार, पंजाब, गुजरात, महाराष्ट्र और कर्नाटक में लिखा गया है। प्रारम्भिक व्याकरण हेमचन्द्र के द्वारा लिखा गया, जिसका नाम था- शब्दानुशासन या सिद्ध हेम व्याकरण । इस युग में विकास की दृष्टि से हिन्दी की निम्न ध्वनिगत एवं रूपगत विशेषताएँ उल्लेखनीय हैं- अपभ्रंश में 8 स्वर थे- अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ए तथा ऐ ; ये मूल स्वर थे। हिन्दी में नए स्वर विकसित हुए-ऐ तथा और इनका उच्चारण क्रमशः “अ, ए तथा ओ” रूप में होता था। इन्हें संयुक्त स्वर कहा गया। अपभ्रंश में डु और ढ़ व्यंजन नहीं थे जो कि हिन्दी में प्रचलित हुए। न्ह, ल्ह, यह जैसे संयुक्त व्यंजन अपने पूर्व व्यंजन के महाप्राण के रूप में प्रचलित हो, मूल व्यंजन बन गए। सहायक क्रियाओं एवं उपसर्गों के अलग प्रयोग से हिन्दी की मूल विशिष्टता-वियोगात्मकता, इसके प्रारम्भिक काल में ही प्रभावी दृष्टिगत होने लगी। अपेक्षाकृत कम होते हुए नपुंसक लिंग शब्द धीरे-धीरे समाप्त हो गए। वाक्य-रचना का स्वरूप सुनिश्चित हो गया। संस्कृत के शब्दों का प्रयोग धीरे-धीरे बढ़ा तथा अरबी, फारसी, तुर्की एवं पश्तो के शब्द भी प्रचुर संख्या में अपनाए गए। 2. मध्यकाल (1501 से 1800 ई. तक) यह काल, हिन्दी भाषा और साहित्य की उपलब्धियों को देखते हुए उसका स्वर्णकाल कहा जा सकता है। राजनीतिक स्थिरता, शान्तिपूर्ण वातावरण एवं कलात्मक उत्कर्ष ने हिन्दी भाषा एवं साहित्य के विकास में अभूतपूर्व योगदान दिया। यद्यपि संस्कृत अब भी पाण्डित्य की प्रदर्शिका थी किन्तु प्रतिभाशाली एवं स्वाभिमानी सन्तों एवं भक्तों ने लोक बोलियों (विशेष रूप से ब्रज और अवधी ) को अपनाकर उसे भाषा के स्तर तक पहुँचा दिया। कृष्ण भक्तों एवं रामभक्तों, विशेषकर सूरदास और तुलसीदास के सुयोग से विकसित इन दोनों बोलियों ने अपनी रचनाओं द्वारा हिन्दी साहित्य एवं शब्दकोश की प्रभूत श्रीवृद्धि की।
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फारसी भाषा में सम्पर्क के कारण हिन्दी में पाँच नयी ध्वनियाँ प्रचलित हुई- क़, ख़, ग, ज़, फ़ । अ से होने वाले शब्दांत में अ का उच्चारण समाप्त होने लगा। जैसे- अर्थात्, सम्राट्, तथागत् आदि। हिन्दी का व्याकरणिक स्वरूप भी लगभग सुनिश्चित हो गया। अपभ्रंश रूप या तो प्रचलन में समाप्त हो गये अथवा हिन्दी के अपने बन गये। मुसलमानों से आत्मीयतापूर्ण सम्बन्ध स्थापित होने के कारण उनकी विविध भाषाओं- अरबी, फारसी, तुर्की, पश्तो आदि के लगभग 6000 शब्द हिन्दी में अपना लिए गए। हिन्दी भाषा की वियोगितात्मकता लगभग पूरी हो गयी और परसर्ग तथा क्रियाओं आदि का अधिक से अधिक स्वतन्त्र प्रयोग होने लगा। सूरदास एवं तुलसीदास के साथ-साथ रीतिकालीन आचार्यों के कारण जहाँ हिन्दी में प्रचुर मात्रा में तत्सम शब्द सम्मिलित एवं प्रचलित हुए वहीं सन्त, सूफियों या मुक्तक परम्परा के रचनाकारों के प्रभाव से तद्भव एवं देशी तथा देशज शब्दों का भी प्रचुर प्रयोग हुआ। व्यापारिक उद्देश्य से भारत आने वाली विभिन्न यूरोपीय जातियों से सम्पर्क के कारण उनकी भाषाओं-पुर्तगाली, स्पेनिश, डच, फ्रेंच तथा अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग प्रायः हिन्दी के अपने व्याकरण के अनुसार प्रचुर मात्रा में होने लगा। 3. आधुनिक काल (1801 ई. से आज तक) इस अवधि को खड़ी बोली हिन्दी का काल कहा जा सकता है। साहित्यिक दृष्टि से ब्रज भाषा और अवधी एक तरफ जनमानस से दूर होकर विशिष्ट वर्ग की भाषा बन गयी, तो दूसरी तरफ हिन्दी प्रदेश पर अधिकार करने वाले अंग्रेजों ने अपनी प्रशासनिक गतिविधियों की सुकरता हेतु 1800 ई. से ही खड़ी बोली को संरक्षण प्रदान करते हुए अपना लिया। यद्यपि साहित्यिक क्षेत्र में कुछ दिनों तक खड़ी बोली ‘गद्यविधा’ और ब्रजभाषा ‘पद्य-विधा’ का माध्यम भाषा न रही, लेकिन धीरे-धीरे राष्ट्रीय चेतना की व्यापकता, राजनीतिक घटनाओं, सामाजिक जागरण और प्रेस के अस्तित्व में आने के कारण खड़ी बोली साहित्यिक स्रजन की एकमात्र भाषा बन गयी। फोर्ट विलियम कॉलेज के भाषा विभाग के अध्यक्ष गिलक्राइस्ट ने खड़ी बोली हिन्दी के विकास में बंग-भंग के परिणामस्वरूप उत्पन्न हुए 1905 ई. के स्वदेशी आन्दोलन की रचनात्मक भूमिका को भी अस्वीकार नहीं किया जा सकता। अहिन्दी भाषा-भाषी के क्षेत्र के विशिष्ट जन प्रतिनिधियों ने भी खड़ी बोली को एक स्वर से स्वदेशी (सम्पर्क) भाषा के रूप में स्वीकार किया। फलतः हिन्दी के विद्वानों एवं रचनाकारों के समक्ष उसे एक विशिष्ट भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने की चुनौती उपस्थित हुई। इसे इन्होंने पूरे मनोयोग से स्वीकार कर हिन्दी से जुड़ी राष्ट्रीय अपेक्षाओं की पूर्ति कर दिखाया। इस दृष्टि से आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का नाम अग्रगण्य है, जिन्होंने खड़ी बोली हिन्दी एवं उसमें (उसके माध्यम से) लिखी जाने वाली रचनाओं का परिष्करण एवं परिमार्जन करके छायावाद के आगमन तक उसे हर दृष्टि से सक्षम भाषा बनने का सुयोग प्रस्तुत किया। कचहरी में उर्दू भाषा और फारसी लिपि के प्रचलन के कारण 1947 ई. तक क़, ख़, ग, ज़ , फ़ वर्ण तो प्रचलन में रहे, किन्तु धीरे-धीरे क़, ख़, ग,- क, ख, ग के रूप में प्रयुक्त होने लगे पर ज़, फ़ प्रचलन में अभी भी बने हुए हैं। अंग्रेजी के प्रभाव से उसके ‘०’ वर्ण के लिए एक नयी ध्वनि ‘ऑ’ प्रचलित हुई। जैसे-कॉलेज, डॉक्टर, कॉलगेट आदि। ( ऑ का उच्चारण ओ एवं आ के मध्य करने की चेष्टा की जाती है।) अंग्रेजी के प्रभाव से एक नया संयुक्त व्यंजन ‘ ड्र ‘ भी प्रचलन में आया है। जैसे- ड्रिप, ड्रग आदि। शब्दांत में ‘ अ ‘ का उच्चारण लगभग समाप्त हो चुका है। जैसे राम, श्याम आदि। शिक्षा, वाणिज्य, आकाशवाणी, प्रेस तथा दूरदर्शन के प्रभाव से व्यावहारिक धरातल पर हिन्दी का व्याकरणिक स्वरूप लगभग सुनिश्चित हो चुका है, फिर भी वर्तमान में इसके कम-से-कम तीन स्वरूप प्रचलित हैं, जिसे निम्नवत् देखा जा सकता है- हिन्दी भाषा-भाषी क्षेत्र के साहित्यकारों द्वारा प्रयुक्त होने वाली साहित्यक हिन्दी। हिन्दी भाषा-भाषी क्षेत्र के जनसामान्य या विशिष्ट लोगों द्वारा प्रयुक्त होने वाली हिन्दी। इसके भी कम से कम तीन स्वरूप प्रचलन में है- शिष्ट लोगों की/से बातचीत में प्रयुक्त होने वाली हिन्दी जिसमें आरम्भ से अन्त तक संयम एवं अनुशासन का पुट रहता है, पारिवारिक धरातल पर प्रयुक्त होने वाली हिन्दी , जिसमें थोड़ी उन्मुक्तता और थोड़ा अनुशासन तथा संयम का पुट रहता है एवं मित्रों तथा समवयस्कों के मध्य बातचीत में पूर्ण उन्मुक्तता के साथ प्रयुक्त होने वाली हिन्दी जिसमें अनुशासन या संयम का सर्वथा अभाव होता है। शासन, विज्ञान, उद्योग, व्यापार, चिकित्सा तथा अन्य प्रमुख क्षेत्रों में माध्यम भाषा: के रूप में प्रयुक्त होने के कारण हिन्दी भाषा में प्रयुक्त पारिभाषिक शब्दों का समन्वय हो रहा है। ये शब्द विविध माध्यमों से प्राप्त हो रहे हैं, जैसे-ग्रहण, निर्माण, अनकलन (तकनीक, अकादमी, डीजल) और सचर्यन (निस्तन्त्री)। अन्य शब्दों में हिन्दी-व्युत्पत्ति और अर्थ ‘ हिन्दी ‘ शब्द की व्युत्पत्ति के सम्बन्ध में निम्नलिखित मत प्रचलित है- परम्परावादी संस्कृत पण्डितों के अनुसार, हिन्दी= हिन् (नष्ट करना) + दु (दुष्ट)। अर्थात् हिन्दू का अर्थ है जो दुष्टों का विनाश करें (हिनस्ति दुष्टान्) शब्द कल्पद्रुम के अनुसार, ‘हिन्दू’ शब्द ‘हीन + दुष + डु’ से बना है जिसका अर्थ है ‘हीनों को दूषित करने वाला (हीन दूषयति)। (नोट- ये दोनों मत कल्पना प्रसूत है।) डॉ. भोलानाथ तिवारी के अनुसार ‘ हिन्दू ‘ शब्द का प्राचीनतम प्रयोग 7वीं सदी के अन्तिम चरण के ग्रन्थ ‘निशीथचूर्णि’ में प्रथम बार मिला है। ‘हिन्दू’ शब्द फारसी है जो संस्कृत शब्द सिन्धु का फारसी रूपान्तरण है। ‘सिन्धु’ शब्द का प्रथम प्रयोग ऋग्वेद में सामान्य रूप से नदी (सप्त सिंधवः), नदी विशेष तथा नदी के आस-पास के प्रदेश के लिए हुआ है। 500 ई. पू. के आस-पास दारा प्रथम के काल में सिन्धु नदी का स्थानीय प्रदेश ईरानी लोगों के हाथों में था। संस्कृत के ‘सिन्धु’ का ईरानी में हिन्दू हो गया जो सिन्धु नहीं के आस-पास के प्रदेश के अर्थ में प्रयुक्त हुआ। कालान्तर में आर्थिक विकास के साथ ‘ हिन्दू ‘ का अर्थ ‘ भारत ‘ हो गया। इसमें ‘ इ ‘ पर बलाघात के कारण अन्त्य ‘उ’ का लोप हो गया। (हिन्दू- हिन्द )। ‘ हिन्द ‘ शब्द में विशेषणार्थक प्रत्यय ‘ ईक ‘ जोड़ने से ‘ हिन्दीक ‘ शब्द बना जिसका अर्थ है ‘ हिन्द का ‘। कालान्तर में ‘ क ‘ लुप्त हो जाने से ‘ हिन्दी ‘ शब्द बना। ‘ हिन्दी ‘ शब्द व्याकरण की दृष्टि से विशेषण है जिसका मूल अर्थ (सं.) सिन्धु (अवे.) → हिन्दु → हिन्द → हिन्दीक → हिन्दी। ग्रीक लोगों ने सिन्धु नदी को ‘ इन्दोस ‘, यहाँ के निवासियों को ‘ इन्दोई ‘ तथा प्रदेश को ‘ इन्दिके ‘ अथवा ‘ इन्दिका ‘ नाम से सम्बोधित किया। ‘इन्दिका’ शब्द अंग्रेजी आदि में ‘ इण्डिया ‘ हो गया। किसी भी प्राचीन भारतीय आर्यभाषा में ‘हिन्दी’ का प्रयोग नहीं मिलता है। केवल कालकाचार्य द्वारा लिखित ‘जैन महाराष्ट्री’ में ‘हिन्दुग’ शब्द मिलता है। (जैसे- ‘सूरिणा भणियम् रामाणो जेण हिन्दुग देसम् बच्चामो”)। भाषा के अर्थ में ‘हिन्दी’ शब्द का प्रयोग भाषा के अर्थ में ‘हिन्दी’ का प्रयोग फारस और अरब से होता है। ईरान के बादशाह नौशेरवाँ (531-579 ई.) ने अपने दरबारी हकीम बाजरोया को भारतीय ग्रन्थ ‘ पंचतन्त्र ‘ का अनुवाद करने के लिए नियुक्त किया। बाजरोया ने ‘कर्कटक और दमनक’ के आधार पर अपने अनुवाद का नाम ‘ कलीला व दिमना ‘ रखा। ‘कलीला व दिमना’ की भूमिका नौशेरवाँ के मन्त्री बुजर्च मिहर ने लिखी। भूमिका में कहा गया कि यह अनुवाद ‘ जबाने-हिन्दी ‘ से किया गया है। अरबी-फारसी में ‘जबाने-हिन्दी’ शब्द का प्रयोग सम्भवत: भारत की समस्त भाषाओं संस्कृत , पालि , प्राकृत , अपभ्रंश के लिए मिलता है। भारत के फारसी कवि औफी ने सर्वप्रथम 1228 ई. में ‘ हिन्दवी ‘ शब्द का प्रयोग समस्त भारतीय भाषाओं के लिए न करके भारत की (सम्भवत: मध्यदेश की) देशी भाषाओं के लिए किया। तैमूरलंग के पोते शरफुद्दीन यज्दी ने 1424 ई. में अपने ग्रन्थ ‘ जफरनामा ‘ में विदेशों में ‘हिन्दी भाषा’ के अर्थ में ‘हिन्दी’ शब्द का प्रथम प्रयोग किया। डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा सम्पादित ‘हिन्दी साहित्य कोश’ (भाग-1) के अनुसार, 13-14वीं शती में देशी भाषा को ‘हिन्दी’ या ‘हिन्दकी’ या ‘हिन्दुई’ नाम देने में अबुल हसन या अमीर खुसरो का नाम सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है।” डॉ. भोलानाथ तिवारी एवं उदय नारायण तिवारी ने भाषा के अर्थ में खुसरो द्वारा प्रयुक्त ‘हिन्दी’ को संदिग्ध माना है। उक्त दोनों विद्वानों ने ‘हिन्दी’ शब्द के प्रयोग को ‘ भारतीय मुसलमान ‘ के अर्थ में रेखांकित किया है। डॉ. भोलानाथ तिवारी ने लिखा है, ‘खुसरो ने ‘हिन्दी’ शब्द का प्रयोग भारतीय मुसलमानों के लिए किया है और ‘हिन्दवी’ शब्द का ‘मध्यदेशीय भाषा’ के लिए यह ‘हिन्दवी’ शब्द वस्तुतः ‘ हिन्दुवी ‘ या ‘ हिन्दुई ‘ है। हिन्दू + ई = अर्थात् हिन्दुओं की भाषा। ‘हिन्दुवी’ शब्द के प्रयोग के कुछ दिन बाद ‘ हिन्दी ‘ (अर्थात् भारतीय मुसलमानों) की भाषा के लिए कदाचित् ‘हिन्दी शब्द चल पड़ा।” हिन्दी कवि नूर मुहम्मद ने लिखा है- “हिन्दू मग पर पाँव न राखौ। का जो बहुतै हिन्दी भाख्यौ।।” 18वीं सदी तक ‘हिन्दी’ मुसलमानों की भाषा न रहकर हिन्दुओं की भाषा की ओर झुक रहा था। 19वीं सदी मध्य के पूर्व तक ‘हिन्दी’ का प्रयोग ‘उर्दू’ या ‘रेख्ता’ के समानार्थी रूप में चल रहा था। ‘उर्दू’ मूलतः तुर्की शब्द है जिसका अर्थ है ‘शाही शिविर’ या ‘खेमा’। डॉ. ग्राहम बेल तथा डॉ. ताराचन्द आदि का कहना है कि ‘उर्दू’ का भाषा के निश्चित अर्थ में सबसे पुराना प्रयोग मुसहफी में मिलता है- ” खुदा रक्खे जबाँ हमने सुनी है, मीर-वो-मिरजा की, कहें किस मुँह से हम मुसहफी ‘उर्दू’ हमारी। ” प्रो. आजाद ने ‘ आबे हयात ‘ में ब्रजभाषा से उर्द का जन्म माना है। ‘ रेख्ता ‘ का फारसी में अर्थ ‘गिरा हुआ’ या ‘गिराकर बनाया हुआ ढेर’ है।। भारत में ‘रेख्ता’ शब्द का प्रयोग पहले छंद और संगीत के क्षेत्र में हुआ। ‘रेख्ता’ नाम 18वीं सदी से प्रारम्भ होकर लगभग 19वीं सदी के मध्य तक उर्दू के लिए चलता रहा। हिन्दी का नवीन अर्थ में लिखित प्रयोग सर्वप्रथम कैप्टिन टेलर ने 1812 ई. में फोर्ट विलियम कॉलेज के वार्षिक विवरण में किया। वर्तमान में ‘हिन्दी’ शब्द मुख्यतः निम्न अर्थों में प्रयुक्त हो रहा है- हिन्दी साहित्य के इतिहास ग्रन्थों में ‘हिन्दी’ का अर्थ है- हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखण्ड, दिल्ली, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश तथा बिहार की भाषा। इस पूरे क्षेत्र को ‘ हिन्दी प्रदेश ‘ कहते हैं। वर्तमान भारतीय साहित्य में ‘हिन्दी’ शब्द भारतीय संघ की राजभाषा (संघ की राजभाषा देवनागरी लिपि में हिन्दी होगी-भारतीय संविधान, अनुच्छेद 343) तथा राष्ट्रभाषा के नाम का द्योतक है। हिन्दी भाषा के विविध रूप हम अपने भावों और विचारों को कभी-कभी लिखकर दूसरों तक पहुँचाते हैं। जब श्रोता सामने होता है तो उससे बोलकर हम अपनी बात कहते हैं; किन्तु जब सामने नहीं होता तो हम लिखकर उस तक अपनी बात पहुँचाते हैं। इसी आधार पर भाषा के दो रूप हो जाते हैं- उच्चारित या मौखिक भाषा, 1. उच्चारित या मौखिक भाषा ‘उच्चारित या मौखिक भाषा’ भाषा का बोलचाल का रूप है। उच्चारित भाषा का इतिहास मनुष्य के जन्म के साथ ही जुड़ा हुआ है। जब से मनुष्य ने जन्म लिया होगा, तभी से उसने बोलना आरम्भ कर दिया होगा। उच्चारित भाषा की आधारभूत इकाई ‘ध्वनि’ है। हर भाषा में अनेक ध्वनियाँ होती हैं। इन्हें ध्वनियों के परस्पर संयोग से तरह-तरह के शब्द बनते हैं, जो वाक्यों में प्रयुक्त किये जाते हैं। ‘उच्चारित भाषा’ वास्तव में भाषा का अस्थाई एवं क्षणिक रूप होता है। उच्चारित भाषा का प्रयोग प्रायः तभी किया जाता है, जब श्रोता वक्ता के सामने होता है। उच्चारित भाषा की तुलना में लिखित भाषा रूप का इतिहास उतना पुराना नहीं है। जब मनुष्य को यह अनुभव हुआ होगा कि वह अपने भावों और विचारों को स्थायित्व प्रदान करें या उन लोगों तक पहुँचाने की कोशिश करें जो उसके सामने नहीं है तो उसने लिखित भाषा चिह्नों का सहारा लिया होगा। इसी आवश्यकता को ध्यान में रखकर प्रत्येक उच्चारित ध्वनि के लिए तरह-तरह की आकृति वाले लिखित चिह्नों की रचना की गई जिनकों ‘लिपि-चिह्न’ या ‘ वर्ण ‘ कहा जाता है। अत: यहाँ उच्चारित आधारभूत इकाई ‘वर्ण’ है। लिखित-भाषा, भाषा का स्थायी रूप है, जिसमें हम अपने भाव-विचारों को आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रख सकते हैं। यहाँ यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि जिन लोगों को लिखना-पढ़ना नहीं आता, इसका यह अर्थ नहीं है कि उन्हें भाषा नहीं आती। वास्तव में हर व्यक्ति जन्म से ही अपनी मातृभाषा को सीख लेता है। कुछ बिना पढ़े-लिखे लोग ऐसे भी होते हैं जो अनेक भाषाएँ बोल और समझ सकते हैं और उन्हें भाषाओं का जानकार माना जाता है, क्योंकि भाषा का मूल तथा आदि रूप तो ‘उच्चारित’ ही है, लिखित रूप तो बहुत बाद में विकसित हुआ है। हिंदी भाषा के उद्भव और विकास का इतिहास भाषा-विज्ञान का अध्ययन क्षेत्र अत्यधिक व्यापक हो गया है और इसके आरंभ काल से लेकर आज तक हिंदी भाषा की उत्पत्ति के सम्बन्ध में अनेक विद्वानों ने प्रर्याप्त प्रकाश डाला है, तथापि हिंदी भाषा के उद्भव की कहानी आज भी हिंदी भाषा विज्ञान के लिए रहस्यमयी बनी हुई है। संसार की कौन सी भाषा आदि भाषा थी और उससे किन-किन हिंदी भाषाओं का किन-किन रूपों में विकास हुआ यह आज भी अनिर्णीत है। अनुमान के आधार पर हिंदी भाषा के उद्भव के सम्बन्ध में हिंदी भाषा वैज्ञानिकों ने कुछ प्रारंभिक प्रयास किए हैं और वे ही आज हिंदी भाषा के वैज्ञानिक अध्ययन के आधार बने हुए हैं। हिंदी भाषा किसी एक व्यक्ति से उत्पन्न नहीं हुई है, वरन् यह एक विशाल जन समूह की वाणी का सामान्य प्रतिफलन है । इस प्रकार हिंदी भाषा समाज की वाणी का समवायी प्रारूप है । ऐसी स्थिति में किसी भी हिंदी भाषा का अविर्भाव काल को या उद्भव को एक निश्चित सीमा रेखा पर नहीं माना जा सकता । यही बात हिन्दी के पक्ष में भी सत्य है। हिंदी भाषा के उद्भव और विकास का इतिहास तीन भागों में बांटा जा सकता है। जिनके बारे में हम पहले ही चर्चा कर चुके हैं। 1. आदिकाल (1000 ई० से 1500 ई० तक), 2. मध्यकाल (1501 ई० से 1800 ई० तक) और 3. आधुनिक काल (1801 ई० से आज तक)। हिंदी भाषा पर आधुनिक हिंदी भाषा विज्ञान व्यापक अध्ययन प्रस्तुत करता है। ऐतिहासिक, राजनीतिक, भौगोलिक और सामाजिक कारणों से जब हिंदी भाषाएँ एक-दूसरे के सम्पर्क में आती हैं तो उनमें एक-दूसरे के बीच आदान-प्रदान के साथ एक -दूसरे को प्रभावित करने और एक-दूसरे से प्रभावित होने की प्रक्रिया भी चलती रहती है । हिन्दी का इतिहास वस्तुत: वैदिक काल से प्रारंभ होता है। उससे पहले आर्यभाषा भाषा का स्वरूप क्या था इसका कोई लिखित प्रमाण नहीं मिलता। साथ ही भारत में आर्यों का आगमन किस काल से हुआ इसका भी कोई प्रमाण नहीं मिलता। साधारणतया यह माना जाता है कि 2000 से 1500 ई. पूर्व भारत के उत्तर पश्चिम सीमांत प्रदेश में आर्यों के दल आने लगे। यहीं पहले से बसी हुई अनार्य जातियों को परास्त कर आर्यों ने सप्त सिंधु, जिसे हम आधुनिक पंजाब के नाम से जानते हैं, देश में आधिपत्य स्थापित कर लिया। यहीं से वे धीरे-धीरे पूर्व की ओर बढ़ते गए और मध्यदेश, काशी, कोशल, मगध, विदेह, अंग, बंग तथा कामरूप में स्थानीय अनार्य जातियों को पराभूत करके उन्होंने वहाँ अपना राज्य स्थापित कर लिया। इस प्रकार समस्त उत्तरापथ में अपना राज्य स्थापित करने के बाद आर्य संस्कृति दक्षिणापथ की ओर अग्रसरित हुई और युनानी राजदूत मेगास्थनीज के भारत आने तक आर्य संस्कृति सुदूर दक्षिण में फैल चुकी थी। आर्यों की विजय केवल राजनीतिक विजय मात्र नहीं थी। वे अपने साथ सुविकसित हिंदी भाषा एवं यज्ञ परायण संस्कृति भी लाए थे। उनकी हिंदी भाषा एवं संस्कृति भारत में प्रसार पाने लगी, किन्तु स्थानीय अनार्य जातियों का प्रभाव भी उस पर पड़ने लगा। मोहन जोदड़ो एवं हड़प्पा की खुदाइयों से सिन्धु घाटी की जो सभ्यता प्रकाश में आई है, उससे स्पष्ट है कि यायावर पशुपालक आर्यों के आगमन से पूर्व सिन्धु घाटी सभ्यता का बहुत अधिक विकास हो चुका था। अत: यह सम्भव है आर्यों की हिंदी भाषा, संस्कृति एवं धार्मिक विचारों पर अनार्य जाति की संस्कृति एवं संपर्क का पर्याप्त प्रभाव पड़ा होगा। अनार्य जातियों के योगदान के कथन से तात्पर्य यह नहीं है कि हिन्दी अथवा प्राकृतों में जो कुछ है वह आर्यों की ही हिंदी भाषाओं से लिया गया है अथवा आर्यों की सारी संपत्ति प्राकृतों और हिंदी को प्राप्त हो गयी। यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि युग-युग की हिंदी भाषा में यहाँ तक कि वैदिक संस्कृत और लौकिक संस्कृत में भी बहुत से अनार्य तत्व सम्मिलित थे। भारत में तथा भारत के विभिन्न क्षेत्रों में अनेक अनार्य जातियाँ रहती थीं जिनमें निग्राटु , किरात , ऑस्ट्रिक या निषाद तथा द्रविड़ (दस्यु) का प्रसार बहुत व्यापक था। निग्रोटु अनार्य जाति का आगमन अफ्रिका से अवश्य हुआ किन्तु वे समुद्री तट के आस-पास के क्षेत्रों में रहे और वहीं से दक्षिण पूर्वी द्वीपों की ओर निकल गए। मध्यदेश के लोगों से उनका संपर्क नहीं हो पाया। वैदिक साहित्य में इनका कोई प्रमाण नहीं मिलता। किरात पहाड़ी लोग थे जिनके वंशज आज भी हिमालय प्रदेश के पश्चिम से पूर्व तक फैले हुए हैं। इन लोगों का आर्यों के साथ संपर्क हुआ। फलस्वरूप इनके बीच संस्कृतियों और हिंदी भाषाओं का आदान-प्रदान भी हुआ। यक्ष, गन्धर्व, सिद्ध और किन्नर आदि पहाड़ी जातियों की संस्कृति परवर्ती आर्य साहित्य में भरपूर मिलती है। इन्हीं के देवताओं, इनकी पूजा विधि, विश्वासों अन्धविश्वासों के साथ-साथ, मणियों, पर्वतीय फल-फूलों, पशु-पक्षी, उपजों के नाम इन जातियों से ग्रहण किए गए। आग्नेय या निषाद जातियाँ पंजाब के पूर्व में बसी थीं। इनकी संस्कृति ग्रामीण थी और कृषि इनका प्रधान कर्म था। आर्यों ने इन्हीं से कृषि कर्म सीखा और उस कर्म में प्रगति की। क्योंकि अधिकांश आर्य जातियाँ मध्य एशिया के पहाड़ी प्रदेश में रहती आ रही थीं। नावें चलाना और मछली पकड़ना भी इन निषाद जातियों का अपेक्षा आग्नेय ‘हाथी’ का जो इतना अधिक महत्व रहा उसका भी यही कारण है। वर्तमान समय में भी राजस्थान, मध्यप्रदेश, बिहार, बंगाल, ओड़िशा, असम और उत्तरप्रदेश के पहाड़ी इलाकों में मुंडा, सांथाल, कोल, हो , शबर, खासी, मानख्मेर कुंकू, भूमिज आदि अनेक आदिम जातियाँ फैली हुई हैं जिसकी हिंदी भाषा, बोली और शब्दावली का तलदेश की बोली से सीधा संपर्क रहा। द्रविड़ कुल की जातियाँ सांस्कृतिक दृष्टि से सबसे अधिक उन्नत रहीं। फलस्वरूप भारत में आर्यों का प्रसार सरलतया संपन्न नहीं हुआ। उनको अनेक प्राकृतिक एवं मनुष्य कृत बाधाओं एवं विरोधों का सामना करना पड़ा। मोहन जोदड़ो, हड़प्पा आदि की खुदाइयों और बलोचिस्तान में प्राप्त ब्राहुई नाम की द्रविड़ हिंदी भाषा के अवशेषों को देखकर इतिहासकारों का यह निश्चित मत है कि सिन्धु सौविर आदि प्रदेशों में द्रविड़ जातियों का प्राबल्य था, जिनसे आर्यों को कठिन संघर्ष करना पड़ा। प्रसार के इस कार्य में अनेक शताब्दियाँ लग गई, इस काल क्रम में हिंदी भाषा भी स्थिर नहीं रह सकी, उसके रूप में परिवर्तन विवर्तन होता गया। जैसे भारतीय आर्य हिंदी भाषा में ट-वर्गीय ध्वनियाँ अनुकरणात्मक शब्दावली, प्रत्ययों , कर्मवाच्य में अतिरिक्त क्रिया , वाक्य योजना के कुछ तत्व द्रविड़ से आए है। इस प्रकार इन द्रविड़ संस्कृति, जाति -जनजातियों की संस्कृतियों के अलावा समय-समय पर शक, हुण, मंगोल, तुर्क, चीनी, अरब, शान आदि अनेक जातियाँ यहाँ आईं और यहाँ की सभ्यता और संस्कृति में घुलमिल गईं। इन सबने भारतीय हिंदी भाषाओं (हिंदी) के निर्माण और विकास में अपना योगदान दिया।
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